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ट्रामा रेल इंजन
Maharajganj kabhar live
महराजगंज। सोहगीबरवा के जंगलों में जिस इंजन के छुक छुक से अंतरराष्ट्रीय पर्यटन की नई इबारत लिखी जानी थी। वही इंजन अब अपनों से दूर हो चुका है। क्योंकि जिले की ऐतिहासिक पहचान रही देश की पहली ट्राम रेल का दूसरा इंजन भी लखनऊ भेज दिया गया है।इसे लेकर विरोध के स्वर उठने लगे हैं। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ लोहे का एक ढांचा ही नहीं था, बल्कि जिले के गौरवशाली इतिहास व इको-टूरिज्म का सपना था। इसे वैश्विक नक्शे पर चमकाया जा सकता था।
जानकारी के मुताबिक वर्ष 1924 में एकमा डिपो से टेढ़ी घाट तक 16 किमी चलने वाली यह ट्राम अंग्रेजों के दौर में जंगल से लकड़ी ढुलाई के लिए शुरू की गई थी। उस समय यह देश की पहली ट्राम वे रेल थी। भाप के इस इंजन में कोयले की जगह लकड़ी के गट्ठर जलाए जाते थे। 1982 में लकड़ी कटान रुकने व घाटे के कारण इसे बंद कर दिया गया था। इसे फिर से चलाने की उम्मीद जगी थी। सोच थी कि इसे हिमालयन रेलवे की तरह मूल रूप में चलाकर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराया जा सकता है। क्योंकि यह देश की पहली ट्राम रेल थी।
वन विभाग व शासन के अफसरों के पहल पर दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के विशेषज्ञ एकमा डिपो पहुंच ट्राम रेल इंजन का मुआयना भी किये थे। लंबे समय से बंद पड़े इंजन के ब्वॉयलर की मरम्मत की जरूरत बताया था। कहा कि इस तरह के इंजन की मरम्मत केरल में संभव है। आंकलन किया गया कि 75 से 80 करोड़ रुपया खर्च करने से देश की पहली ट्राम वे रेल को चलाया जा सकता है। नई लाइन बिछाने में लगभग 16 करोड़ व स्टेशन व सुविधाओं के विकास में 40–50 करोड़ खर्च का अनुमान था। पर, लंबा चौड़ा बजट देख अधिकारी बेबस हो गए। हालांकि इस पर जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई प्रयास नहीं किए गए। इस वजह से 2009 में ट्राम रेल का एक इंजन लखनऊ चिड़ियाघर भेज दिया था। जहां उसे दर्शकों के दीदार के लिए रखा गया है। अब दूसरे इंजन को भी लोगों के विरोध के बाद भी लखनऊ भेज दिया गया है। ऐतिहासिक इंजन को लखनऊ जाते देख लक्ष्मीपुर क्षेत्र के लोग मायूस हो गए। उनको आस थी कि भविष्य में इस हेरिटेज ट्रेन को पर्यटन के लिए चलाया जाएगा तो क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा होंगे लेकिन सपने चकनाचूर हो गए।


